“प्रत्येक व्यक्ति सुखी या प्रसन्न तो होना चाहता है, परंतु वैसे काम करना नहीं चाहता, जिनके करने से सुख या प्रसन्नता मिलती है।”
ऐसे कौन से काम हैं, जिनको करने से वास्तविक प्रसन्नता मिलती है। “वे काम हैं, परोपकार करना। दूसरों का भला सोचना, उनको सही सलाह देना। केवल सलाह ही नहीं देना, बल्कि उनके कार्य में सहयोग/ सहायता भी करना। उनका दुख दूर करना, उन्हें सुख देना।” ऐसा करने से वास्तविक प्रसन्नता मिलती है।
ईश्वर इस संसार का राजा है। हम उसकी प्रजा हैं। हम पर ईश्वर का कानून संविधान चलता है। “कुछ बुरे कर्म हैं, जैसे झूठ छल कपट धोखा बेईमानी चोरी डकैती लूटमार हत्याएं अपहरण ब्लैक मार्केटिंग स्मगलिंग इत्यादि, ऐसे काम करने वालों को ईश्वर भयंकर दंड देता है। उसने दंड देने के लिए पशु पक्षी कीड़े मकोड़े सांप बिच्छू शेर भेड़िया आदि लाखों योनियां बना रखी हैं। जो जो व्यक्ति अपराध अधिक करता है, उस उस व्यक्ति को ईश्वर इन लाखों योनियों में उसके कर्मों के अनुसार पहुंचा देता है। और वे लोग वहां पशु पक्षी कीड़े मकोड़े सांप बिच्छू आदि योनियों में अपने-अपने कर्मों का दंड भोगते हैं।”
“जो व्यक्ति ऊपर बताए परोपकार के कार्य अधिक करता है, ईश्वर उसे बहुत सुख शांति आनन्द और वास्तविक प्रसन्नता देता है।” “इसलिए बुरे कर्मों से बचें और ऊपर बताए शुभ कर्मों का आचरण करें। आपको ईश्वर वास्तविक प्रसन्नता देगा।”
आपला परिवार नागेबाबा परिवार
लेखक–स्वामी विवेकानन्द
